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सरकार का प्रभाव पाने के लिए लोगो को गुमराह करती फिल्मे

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पिछले तीन महीनों में लगातार ऐसी तीन फिल्में आई हैं जो विपक्ष दल के इतिहास और वर्तमान सरकार की उपलब्धियों पर आधारित थीं. ऐसे तो राजनीतिक इतिहास पर फिल्में बनती रही हैं लेकिन इन फिल्मों के आने का समय और प्रस्तुतिकरण का तरीका कई सवाल खड़े करता है. जुलाई में ‘इंदू सरकार’, अगस्त में ‘टाॅयलेट एक प्रेमकथा’ और सितंबर में ‘बादषाहो’, ये तीनों ही फिल्में कहीं न कहीं राजनीति से जा मिलती हैं. ‘इंदू सरकार’ और ‘बादशाहो’ फिल्म में इमरजेंसी के समय की स्थितियों को दिखाया गया है. लेकिन, इनमें जहां इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है वहीं, एक तरफा घटनाक्रम को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया है.

‘इंदू सरकार’ के पहले ही सीन में नसबंदी को किसी सांप्रदायिक दंगे की तरह दिखाया गया है जिनमें घरों से निकाल-निकालकर लोगों को मारा जाता है. यह सही है कि उस समय नसबंदी के टार्गेट थे और काफी सख्त थे लेकिन नसबंदी ऐसा मुद्दा नहीं जो पूरी तरह जनता के अहित में हो. इमरजेंसी के बाद देश की जनसंख्या में कमी भी हुई थी और आर्थिक वृद्धि भी देखी गई. इमरजेंसी में सरकारी सेवाएं भी बेहतर हो गई थीं. लेकिन, एक तरफा चित्रण करके लोगों को भ्रमित किया गया है. इसी तरह बादशाहो फिल्म में संजय गांधी को एक गुंडे और छिछोरे शख्स की तरह दिखाया गया है जो सारा खजाना हड़पना चाहता है और महारानी से छेड़छाड़ करता है. जबकि ये एक काल्पनिक कहानी है और महारानी गायत्री देवी से भी ये कहानी पूरी तरह मेल नहीं खाती है. इसमें जबरदस्ती नसबंदी केंद्रों के डाले गए शॉट भी अटपटे लगते हैं.

‘टायॅलेट एक प्रेमकथा’ अच्छा संदेश देती है लेकिन इसमें भी सिर्फ सरकार के नजरिए को सामने रखा गया है. टाॅयलेट न बनने के पीछे सरकारी स्तर पर फैला भ्रष्टाचार भी जिम्मेदार है. इसके अलावा यूपी के मुख्यमंत्री के मुंह से नोटबंदी की तारीफ में निकलवाया गया डायलाॅग अप्रासंगिक और जबरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है. फिल्मकार अपनी फिल्म में क्या दिखाता है ये उसकी मर्जी है लेकिन उसे लोगों को भ्रमित करने का अधिकार नहीं है. इन विषयों पर निष्पक्षता के साथ भी फिल्में बनाई जा सकती थीं. आखिर तथ्यों के साथ तोड़मरोड़ करने और एकतरफा हकीकत दिखाने का मतलब क्या है?

कई बार फिल्मकार मौजूदा सरकार की कृपा पाने के लिए अपनी कला का इस्तेमाल करते आए हैं. अपने फायदे के लिए ये फिल्म के जरिए चापलूसी करने लगते हैं. लेकिन, इस तरह वो अपने पेशे से खिलवाड़ और दर्शकों से धोखा कर रहे हैं. वहीं, कई बार तात्कालिक सरकार में बनी सरकार विरोधी फिल्मों पर भी बैन लगाया जाता रहा है. इंदिरा गांधी के समय में भी ऐसा हुआ है. ऐसा होना फिल्म की ताकत भी दिखाता है कि सत्ताधारियों पर इनके बनने और रुकने का असर पड़ता है. ऐसे में इस प्रभावशाली माध्यम का उपयोग किसी सरकार के फायदेे के बजाए जनता के पक्ष में करना जरूरी है. राजनीतिक इतिहास और मुद्दों पर फिल्म बनाना बहुत अच्छा है क्योंकि जो लोग किताबें नहीं पड़ पाते वो इस माध्यम से इतिहास से रूबरू हो जाते हैं. लेकिन, अगर कला का गलत इस्तेमाल किया जाए तो ये लोगों के साथ सिर्फ धोखा है और नई पीढ़ी को गुमराह करना है.

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