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स्वच्छ भारत मिशन : बदल रही जिंदगियां

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पश्चिम बंगालके पूर्वी मिदनापुर जिले की अवंतिकपा अभी 12 साल की है। उसकी ज़िंदगी के 11 साल एक ऐसे घर में गुजरे हैं जहां टॉयलेट नहीं था। किशोर होती अवंतिकपा को खूब पता है कि खुले में टॉयलेट के लिए जाना कई किस्म के जोखिम से भरा है, साथ ही इसमें लाज-लिहाज भी जुड़ा है। उसने माता-पिता को इसके बारे में बताया और उसके घर में टॉयलेट बन गया। वह खुशी से बताती है, ‘अब मुझे कुत्तों का भय नहीं सताता। मुझे मुंह अंधेरे टॉयलेट के लिए नहीं जाना पड़ता।’

पूर्वी सिक्किम के एक को-एजुकेशन (सह-शिक्षा) वाले स्कूल में टॉयलेट बनवाने के बाद लड़कियों की उपस्थिति बढ़ गई है। स्कूल की प्रिंसिपल आरती गौतुम का कहना है, ‘पहले उन्हें (लड़कियों को) टॉयलेट के लिए झाड़ियों में जाना पड़ता था। कई छात्र डायरिया के कारण बीमार पड़ जाते थे लेकिन, अब स्कूल छोड़ चुकी बहुत-सी लड़कियां फिर से अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए (स्कूल) आने लगी हैं।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन की कामयाबी की ये दो खुशगवार कहानियां हैं लेकिन, किसी योजना की कामयाबी के आकलन के लिए कथा-कहानियों का सहारा लेना सही तरीका नहीं है। सवाल है कि टॉयलेट का निर्माण सिर्फ सरकारी फाइलों में हुआ है या फिर जहां बने हैं वहां किसी व्यावहारिक या सांस्कृतिक बाधा के कारण उनका इस्तेमाल नहीं हो सका है। इसी कारण स्वच्छ भारत मिशन के तीन सालों में क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्यूसीआई) ने ग्रामीण इलाकों में एक व्यापक सर्वेक्षण के जरिये देखना चाहा कि सेवा दायरे और गुणवत्ता के लिहाज से किए गए वादे से कितना मेल खाती है।

क्यूसीआई प्रमाणन (एक्रीडिटेशन) की एक राष्ट्रीय संस्था है, जिसने साफ-सफाई का मूल्यांकन अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया है। मैनेजमेंट की पढ़ाई मंे एक बुनियादी बात बताई जाती है कि जिस चीज को मापा-तौला जाता है उसमें सुधार भी होता है। क्यूसीआई के सर्वेक्षण का नाम है, स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2017। इसके अंतर्गत 700 जिलों के 140,000 घरों का जायजा लिया गया है। सर्वेक्षण में शामिल हर घर की जियो-टैगिंग (भौगोलिक आधार पर नाम देना) हुई ताकि सर्वेक्षण को लेकर कोई शक-शुबहा रह जाए। सर्वेक्षण में तकरीबन छह माह लगे और सर्वेक्षण 2017 के अगस्त महीने में पूरा हुआ, जिससे कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष निकले :

स्वच्छता मिशन की आलोचना करते हुए बताया गया कि बने हुए टॉयलेट में अनाज रखा जा रहा है लेकिन, एक निष्कर्ष यह है कि टॉयलेट की तादाद और इस्तेमाल में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। योजना के तीन साल बाद कहा जा सकता है कि लोगों की टॉयलेट जाने की आदतों में स्पष्ट अंतर आया है, खासकर ग्रामीण भारत में। 2011 की जनगणना के मुताबिक 10 में से 5 घरों में टॉयलेट नहीं थे यानी तकरीबन 50 फीसदी परिवारों के घर टॉयलेट विहीन थे। ग्रामीण इलाकों में 10 में से 7 घरों में टॉयलेट सुविधा नहीं थी, जबकि शहरों में 10 में से 2 परिवारों के सदस्य खुले में टॉयलेट जाने पर मजबूर थे। किंतु सर्वेक्षण कहता है कि 10 में से 3 से भी कम घरों (26.75%) अब टॉयलेट नहीं हैं। सबसे ज्यादा सुधार ग्रामीण इलाकों में आया है, जहां ऐसे घरों की तादाद घटकर 32.5 प्रतिशत रह गई है, जहां टॉयलेट नहीं है। जबकि, 2011 की जनगणना में ऐसे घरों की तादाद 69 प्रतिशत थी। यानी तीन वर्षों में वहां टॉयलेट की संख्या दोगुनी बढ़ी है। शहरी इलाकों में टॉयलेट रहित घरों की संख्या 18 से घटकर 14.5 फीसदी रह गई है।

जहां तक इस्तेमाल की बात है टॉयलेट सुविधा वाले 10 में से 9 घरों (91.29 प्रतिशत) में इसका इस्तेमाल हो रहा है। यही शहरी इलाकों में हुआ। स्वच्छ सर्वेक्षण 2016 में 73 शहरों को शामिल किया गया था। इसमें से 54 शहरों ने ठोस कचरा प्रबंधन (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) के मामले में अपने अर्जित अंकों में इजाफा किया है। कोई कह सकता है कि खुले में टॉयलेट से मुक्त घोषित शहर में अब भी यह जारी है लेकिन, ऐसे मामले इक्का-दुक्का ही मिलेंगे। भले शत-प्रतिशत कामयाबी नहीं मिली है लेकिन, स्वच्छ भारत मिशन के विशाल आकार को देखते हुए क्या 90 प्रतिशत से ज्यादा का आंकड़ा उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है? मिशन के कारण शहरों और जिलों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता शुर हुई है। स्व-सहायता समूह, स्वयंसेवी संस्थाएं और इलाके के जाने-माने लोगों ने योगदान दिया है और नतीजे साफ दिखाई दे रहे हैं।

बेशक, मिशन को सरकार का सहारा है लेकिन, यह सामाजिक परियोजना है और हम सब इसके भागीदार और संचालक हैं। इस योजना का एक पक्ष अगर स्थानीय निकायों को धन तथा संसाधन मुहैया कराना है तो दूसरा पक्ष जाति, लिंग और गरीबी का है जो उतना ही महत्वपूर्ण है। योजना का मापन, उसके दर्जे का निर्धारण और साथ ही खुले में टॉयलेट के चलन पर अंगुली उठाना तथा ऐसा करने वालों को शर्मिंदा करना- ये तीन काम स्वच्छ भारत मिशन से जुड़े हैं, जो कारगर साबित हुए हैं। हमें इस फार्मूले का इस्तेमाल कामकाज के अन्य क्षेत्रों में भी करना चाहिए। रेलवे एंड पोर्ट (बंदरगाह) अथॉरिटी ने इससे मिलती-जुलती परियोजना पर काम शुरू कर दिया है।

ढांचागत सुविधाओं के साथ व्यवहार में आए बदलाव का भी आकलन जरूरी है। सफाई की समस्या को सिर्फ कंक्रीट के ढांचे खड़े करके दूर नहीं किया जा सकता। अगर इसे लेकर जन आंदोलन चले, साथ ही गति देने के लिए जमीनी तैयारी हो और किए गए काम के असर का आकलन किया जाए तो नतीजे ज्यादा तेजी से आएंगे। लेकिन, बड़ी सच्चाई यह भी है कि सैकड़ों भारतीय आज भी ऐसी बीमारियों के कारण जान गंवाते हैं, जिनसे आसानी से बचा जा सकता है। मानसून के बाद एन्सिफेलाइटिस और डायरिया फैलने की एक बड़ी वजह है भूमिगत पानी में मल जाना। डायरिया के कारण माताओं का वजन सामान्य से कम होता है। फिर ऐसी महिलाओं की संतान मानक से कम वजन और लंबाई की होती है। ऐसे बच्चे जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं। यह अंतहीन दुष्चक्र है। समाधान ज्यादा महंगा नहीं पड़ता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट का उठ खड़ा होना कहीं ज्यादा महंगा साबित होता है। और, ठीक इसी कारण से स्वच्छ भारत मिशन जोर-शोर से जारी रहना चाहिए तथा प्रभावों के आकलन से जुड़े अध्ययन और उनसे हासिल सीख के सहारे इसे ज्यादा से ज्यादा कारगर बनाया जाना चाहिए।

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