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किसने पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम दिया….और क्यों?

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पाकिस्तान कैसे बना परमाणु सम्पन्न देश

ओसामा बिन लादेन को लेकर किये अमेरिका के सफल ऑपरेशन के बाद पाकिस्तान का नाभिकीय सम्पन्न होंने का  मुद्दा फिर से गरमा गया है जब खुफिया तंत्रो से पता चला की पाकिस्तान की परमाणु निर्माण दर बड़ी तीव्रता से बढ़ रही है जो इस लिहाज से चौथा राज्य होगा इससे पहले इस श्रेणी में अमेरिका,रूस और चीन आते है।

16 मई,2011 को मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में पाकिस्तान के नाभिकीय प्टोग्राम के पितामह कहे जाने वाले [<a href=]http://ए.के.खान”>ए.के.खान ने दावा किया कि हम पहले नाभिकीय अस्त्रों को लेकर इतने गम्भीर नही थे लेकिन जब 1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो हमने इस और भीरता से सोचना शुरू किया और मुझे स्वदेश लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा क्यों की मैं पाकिस्तान को भारत के हाथों “नाभिकीय रूप से ब्लैकमेल” होने  से बचाना चाहता था और पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बंनाने में जुट गया

हो सकता है पाकिस्तान “खान” को इस्लामिक बम का पिता कहे या उसका बखान करता फिरे वो कभी ये नही बताना नही चाहेगा कि खान ने अपनी शिक्षा metllurgical science में पूरी कीऔर उसका नाभिकिय अस्त्र निर्माण से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध भी नही रहा है।

हुआ ये की 1972 में  खान को डच प्रयोगशाला द्वारा लैब से  सम्रद्ध व् उच्च कोटि के यूरेनियम के निर्माण के ब्लू प्रिंट चोरी करने के जुर्म में आरोपी घोषित किया गया,खान पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम जिसमे डिजाइन,विकास और परीक्षण सम्मिलित होता है से सम्बंधित नही रहा । 1972 में पाकिस्तान ने गुप्त रूप से परमाणु कार्यक्रम को शुरू कर दिया था, उस समय खान पाकिस्तान में नही था। खान को 1976 के दौरान पाकिस्तान के यूरेनियम सम्वर्धन कार्यक्रम के प्रभार पर ही रखा गया था।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के एक नाभिकिय शक्ति के रूप में उत्पत्ति और विकास के पीछे चीन का महत्वपूर्ण हाथ माना जाता है। चीन ने पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने के ब्लू प्रिंट और उच्च गुणवत्ता वाले यूरेनियम व् ट्रिटियम,महत्वपूर्ण निर्माण उपकरण, वैज्ञानिकों की टीम व् अन्य अति महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराए है।

परमाणु हथियारों के प्रसार पर एक अग्रणी विशेषज्ञ गैरी मिल्होलिन कहते है कि चीन की सहायता के बिना पाक कभी भी परमाणु बम नही बना पाता – ये तथ्य व् आंकड़े WMD द्वारा किये गए एक सर्वे जिसका प्रकाशन कार्नेगी एण्डोमेन्ट फ़ॉर पीस में हुआ था से जुटाये गये है।

पिछले 15 सालों में पाकिस्तान के परमाणु कर्यक्रम में चीन की सहायता अत्यं महत्पूर्ण रही खासकर 1980 के दशक में । माना जाता है कि चीन अपने पहले से निर्मित परमाणु बमो से पाकिस्तान की जरूरत के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराता था…सम्भवतः इस तरह के दो हथियारों के लिए पर्याप्त सम्रद्ध यूरेनियम प्रदान करता था।

इस सर्वे के अनुसार चीन द्वारा पाकिस्तान को खुसाब में प्लूटोनियम प्रोडक्शन रिएक्टर के निर्माण में सहायता दी गयी..और चस्मा में एक असुरक्षित प्लूटोनियम पुनःप्रोसेसिंग सुविधा प्रदान करने का वर्णन किया है।

परमाणु शक्ति सम्पन्नता में भारत पाकिस्तान ही नही बल्कि चीन से भी आगे था । 1950 के दशक में भारतीय नेतृत्व और वैज्ञानिक समुदाय ने  आमतौर पर परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण सहयोग के माद्यम से तीसरी दुनिया के उत्थान की विचारधारा के तहत सदस्यता ली पर चीन सदा से ही सैन्य विचारधारा पर ही बना रहा जिससे USSR से सहायता प्राप्त थी।

अगले कुछ हफ़्तों में भारतीय वैज्ञानिक प्रमुख श्री होमी भाभा ने एक परमाणुनिवारक तंत्र की स्थापना का विचार तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को बताया जिसे उन्होंने आगे विकसित होने की स्वीकृति दे दी ..परन्तु अचानक भाभा की मृत्यु और मजबूत राजनैतिक विरोध के आगे इंदिरा गांधी ने 1974 में भारत के पहले नाभिकीय परीक्षण की स्वीकृति दे दी…

इस बीच पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार और बेहतर और आधुनिक वितरण व्यवस्था ने सही मायनों भारत के नाभिकीय प्रभाव को क्षीण क्र दिया था। पाकिस्तान सोच रहा था कि उसने नाभिकिय शक्ति सम्पन्नता पा ली है अब वो अजेय है पर इसके पीछे चीन ने अपना खेल खेलते हुए पाक के रूप एक परमाणु सम्पन्न देश बनाकर एशिया में अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी भारत को पटकनी दे दी थी ।

चीन ने पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को अपनी नाभिकीय तकनीक प्रदान करते हुए प्रॉक्सी नीतियों के तहत  अमेरिका और उसके एशियाई सहयोगियों,दक्षिण कोरिया और जापान को  मात दे डाली थी या यूँ कहे की एक तीर से कई देशों का शिकार कर रहा थे चीन उस दौर में।

जून 2002 में CIA ने राष्ट्रपति बुश को उत्तर कोरिया के खतरनाक व् व्यापक नाभिकीय महत्वकांशाओ से अवगत कराया तथा ये भी बताया कि पाकिस्तान अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में मुख्य आरोपी उत्तरी कोरिया जिसे चीन से परमाणु तकनीक प्राप्त हो चुकी थी का साथ परमाणु बम बनाने में  दे रहा था । एक रिकॉर्ड के मुताबिक पाकिस्तानी वैज्ञानिक [<a href=]http://ए.क्यू.खान”>ए.क्यू.खान ने लगभग 13 बार उत्तर कोरिया की यात्रा की,इसके अलावा उसने चीन को अपने विश्वास में लेते हुए वर्चस्व स्थापित किया और साथ ही साथ अमेरिका और उत्तरी कोरिया के बीच एक ईमानदार दलाल के रूप में अपनी पहचान बनाई।

17 फरवरी 2004 ने एक और खुलासा किया की लीबिया के परमाणु हथियार चीन से आये थे। लीबिया में हुयी गहन जांच  में पाकिस्तान और चीन द्वारा बम बनाने के डिजाईन और अन्य जानकारी उपलब्ध कराई गई है और इन दोनों देशों को इस मामले में संलिप्त पाया गया । इसमें।किस प्रकार से बम को बैलेस्टिक मिसाइल पर फिट करना है आदि जानकारियां उपलब्ध कराई गई थी।

एक अन्य खुलासे में पता चला की सद्दाम हुसैन के निरस्त किये गए परमाणु कार्यक्रम का बम डिजाईन भी चीन द्वारा निर्मित था।

15 जून 2004 को “राइटर” ने बताया कि अमेरिकी चीन आर्थिक और सुरक्षा समीक्षा आयोग से कांग्रेस जांचकर्ताओं ने चीन पर तेल के बदले ईरान को परमाणु तकनीक बेचने का आरोप लगाया । पाकिस्तान और चीन ने 1987 और 1990 में ईरान के साथ दीर्घकालिक परमाणु सहयोग /समझौते पर हस्ताक्षर किये । दोनों देशों ने टेक्निकल स्टाफ,एक 27kw का नाभिकीय रिएक्टर और 2 300 मेगावाट क्विनशन पावर रिएक्टर ईरान को देने का समझौता किया था।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी आजतक आज भी पाकिस्तान को संदिग्ध नजरो से देखती है कि क्या वास्तव में पाक ने 1986 में परमाणु बम बना लिया था…और ईरान को बम बनाने में सहयोग किया ।

कुछ लीक खबरों से पता चला था कि पाक ने प्लूटोनियम निष्कर्षण और gas sentifuse extraction में ईरानी वैज्ञानिकों को पारंगत कर दिया था।

1938 में एक किताब छपी थी जिसमे परमाणु बमो के राजनैतिक इतिहास को वर्णित किया गया था..इसमें 1938 में नाभिकीय विखण्डन की खोज और नाभिकीय मलबे से भरी ट्रेन और अस्थिर भविष्य की विवेचना की गयी थी

थॉमस रीड और डैनी स्टिलमन के अनुसार चीन एक प्रॉक्सी गेम खेल रहा है जो की खतरनाक परमाणु खतरा बन चुका है वो पर्दे के पीछे से अपने प्रतिद्वंदियों के प्रतिद्वंदियों को नाभकीय अस्त्र देता है और गुप्त रूप से एक छद्म युद्ध लड़ता है

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