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Soldier – A Larger than life individual

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जगह: सियाचिन।
तारीख: 8 नवंबर 2010।
समय: सुबह के 8 बजे।
भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट परीक्षित हस्तेकर चीता हेलिकॉप्टर के जरिए भारतीय सैनिकों तक रसद पहुंचाने जा रहे थे। हेलिकॉप्टर टेकऑफ के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 22 हजार फीट की ऊंचाई से नीचे गिरे हस्तेकर के सिर में गंभीर चोट आई और वह कोमा में चले गए। उन्हें तत्काल विमान से दिल्ली लाया गया।

यहां के अस्पताल में इलाज के करीब 30 दिन बाद वह कोमा से बाहर आए, लेकिन दिमागी चोट के कारण वह शारीरिक-मानसिक तालमेल खो चुके थे। इसके बावजूद न तो हस्तेकर और न उनके परिवार ने हौसला खोया। परिवार की मदद से हस्तेकर हालात से लड़ने लगे। रिकवरी के संकेत मिलने लगे। करीब 8 महीने लगे, उन्होंने सपोर्ट की मदद से खड़ा होने की कोशिश की। कमांड फॉलो करने लगे।
साल भर बीतते-बीतते वह खुद से बोलने की कोशिश करने लगे। और छह महीने बाद वह गाने की कोशिश भी करने लगे। वक्त बीतता गया, वह ड्रॉइंग बनाने लगे, गिटार बजाने लगे और दो साल खत्म होते-होते अपने बूते जिम में कसरत भी करने लगे। फिर उन्होंने खुद से खाना खाने की भी शुरुआत कर दी। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने हाल में एक समारोह में हस्तेकर के हौसले की तारीफ करते हुए कहा कि वह एक बार फिर से हेलिकॉप्टर उड़ाने की इच्छा रखते हैं।

मुंह में पेंसिल रखकर लिखना सीखा
फ्लाइंग अफसर एमपी अनिल कुमार भारतीय वायुसेना में मिग 21 के पायलट थे। 1988 में मोटरसाइकल से हुए एक हादसे में वह 24 साल की उम्र में उनके शरीर में गर्दन से नीचे के हिस्से को लकवा मार गया। इसके बाद उन्हें पूरी जिंदगी वीलचेयर पर बितानी थी। मन में नेगेटिव विचार आने लगे तो उन्होंने इससे लड़ने का फैसला किया। उन्होंने नई जिंदगी मीडिया में कमेंटेटर के तौर पर शुरू की।

मुंह में पेंसिल रखकर वह लिखने की कोशिश करने लगे। उनका पहला निबंध एयरबोर्न टु चेयरबोर्न था, जिसे काफी सराहा गया। महाराष्ट्र और केरल में इसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया। 26 साल वीलचेयर पर बिताने के बाद अनिल कुमार का 2014 में निधन हो गया। हाल में उनकी जिंदगी पर आधारित एक किताब बोर्न टु फ्लाई आई, जिसके लेखक एयर कमोडोर नितिन साठे का मानना है कि एमपी अनिल कुमार की जिंदगी कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही और आगे भी रहेगी।

करगिल में घायल, ब्लेड रनर बने
1999 में करगिल में हुई जंग में मोर्टार लगने के बाद मेजर डीपी सिंह बुरी तरह घायल हो गए। अस्पताल लाए जाने पर डॉक्टरों ने पहले तो उन्हें मृत घोषित कर दिया, लेकिन बाद में पता चला कि उन्होंने दायां पैर खो दिया है। जब वह जिंदगी की कड़ियों को दोबारा से जोड़ने लगे तो उन्हें दौड़ने की इच्छा हुई। उन्होंने तीन मैराथन में हिस्सा लिया। फिर उन्हें साउथ अफ्रीका के ब्लेड रनर ऑस्कर पिस्टोरियस से फाइबर ब्लेड से बने कृत्रिम पैर की जानकारी मिली।

सेना ने मेजर डीपी सिंह को यह ब्लेड मुहैया कराया। इस ब्लेड से हाफ मैराथन दौड़ने वाले वह पहले भारतीय बने। अपने हौसले की बदौलत उन्हें भारत का ब्लेड रनर कहा गया। अब वह 27 नवंबर से 3 दिसंबर के बीच दिल्ली से चंडीगढ़ के बीच 7 शहरों में दिव्यांगों के लिए दौड़ के 7 इवेंट करना चाहते हैं। दिव्यांग दौड़ खत्म करने के बाद स्वच्छता अभियान में भी भाग लेंगे। मेजर डीपी सिंह का कहना है कि दिव्यांग यह बताना चाहते हैं कि अगर ठान लिया जाए तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है।

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