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गांधी वध में अमेरिकी एजेंसी का हाथ ??

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महात्मा गांधी भारत के लिए ऐसे व्यक्तित्व रहे जिनको सभी ने सराहा और समर्थन दिया व् स्वीकार किया है यहाँ तक की आलोचकों ने राष्ट्र के लिए उनके बलिदान के लिए  उनकी प्रशंसा भी की है .. हालांकि उनकी हत्या अबतक एक अनसुलझा रहस्य ही रहा है,गांधी की हत्या के पीछे कई सिद्धान्त और मिथ्याये भी है लेकिन चीज़े इतनी आसान भी नही है जितनी दिखाई दे रही है ।

ऐसा लग भी रहा है गांधी जी की हत्या के राज अभी उजागर करने का सबसे अच्छा समय है,निसन्देह ये स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा राज है जिसका रहस्योद्घाटन होना भी अत्यंत जरूरी है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण पर कार्यवाही शुरू भी कर दी है और गांधी वध के पीछे के सच को जानने के लिए एक याचिका पर कुछ प्रश्न भी पूछे है और वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्र शरण जो की एमिकस क्यूरी के तौर पर नियुक्त किये गया है कि सहायता ली जा रही है। जस्टिस ऐस.ए.बॉब और एल.नागेश्वर राव की एक पीठ के अनुसार इस विशिष्ट केस में “कानून में कुछ भी नहीं किया जा सकता है” लेकिन शरण ने कहा था कि एक पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने इसका मूल्यांकन करने के लिए उसे बाध्य नही किया था।
इस मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होनी है जिसमे कुछ प्रश्न उठाये गये है .. जिसमे 15 नवम्बर 1949 को नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे की सज़ा और निष्पादन के मामले में आगे की जांच के आदेश देने के लिए अब सबूत कैसे इकट्ठे किये जायेंगे ,जैसा की ये साबित हुआ की इन दोनों ने महात्मा गान्धी की हत्या की साजिश रची । 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर हत्या की गयी .. । गांधी हत्या की जांच की याचिका मुम्बई के डॉ पंकज फडनिस द्वारा दायर की गयी है जो अभिनव भारत के शोधकर्ता और ट्रस्टी है,उन्होंने कई आधारों पर ये जांच फिर से खोलने की मांग की है।

डॉ फडनिस ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा कवर-अप करार देते हुए उन्होंने “तीन बुलेट सिद्धान्त” पर सवाल उठाया है जिसमे कानून के विभिन्न अदालतों द्वारा आरोपी गोडसे और आप्टे को दोषी ठहराया और फांसी दी गयी थी और विनायक दामोदर सावरकर को साक्ष्यों की कमी कारण सन्देह का लाभ दिया गया था।

उन्होंने आगे कहा कि दो दोषियों के अलावा तीसरा हत्यारा भी हो सकता है | द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका के एक खुफिया एजेंसी और OSS (office of strategic services) की जांच की आवश्यकता है या नही ।  CIA ने गांधी को बचाने की कोशिश की थी क्योंकि उनके पास इस मुद्दे पर कई खुफिया सूचनाएं थी। उनके तर्क के अनुसार गोडसे और आप्टे द्वारा दायर की गयी अपील को 1949 में पूर्व में पंजाब उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था पर प्रवी कॉउन्सिल ने इस मामले को वापस इस आधार पर भेजा था कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय जनवरी 1950 में अस्तित्व में आएगा।

यह भी पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी इस मामले का निर्णय नही लिया,कपूर आयोग की रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में नही आयी है । कपूर आयोग की टिप्पणियाँ सटीक नही है या हो सकती है लेकिन तथ्य यह है कि सत्र अदालत के फैसले से निष्पादन किया किया जिसकी हाई कोर्ट ने पुष्टि की थी।

हम आशा करते है कि गांधी वध का सच सबके सामने आये क्योंकिनिस घटना ने हमारे राष्ट्र का मार्ग बदला है जिसका स्तय सबको पता होना चाहिए… हालांकि इस समय हम किसी भी तथ्य की झूठला नही सकते,लेकिन गांधी वध में तीसरे व्यक्ति की भागीदारी के बारे में सोचे ..क्या मकसद था उस तीसरे व्यक्ति का । यह मुद्दा एक विशिष्ट समूह के विरुद्ध एक षड्यंत्र है और प्रत्येक नागरिक की सहानुभूति प्राप्त करने का षड्यंत्र भी हो सकता है

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