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किसने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र रचा और क्यों?

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भारतवर्ष  में एक जनधारणा पनप रही है कि निहित स्वार्थ वाले लोगो द्वारा भारत का इतिहास विकृत किया गया है ,किसी बहती शक्ति केंप्रभाव में इन लोगो ने तथ्यों को विकृत करते हुए कई ऐतिहासिक घटनाओं व् कृत्यों का इतिहास से नामोनिशान तक मिटा दिया है ।

ऐसा नही है इन कुसित प्रयासों का विरोध नही हुआ है .. अतीत में भारत के वास्तविक इतिहास को खोलने के कई प्रयास किये गए लेकिन उनसे आशातीत सफलता नही मिल पाई । आक इस लेख में मैं भारतीय वेदों के विरूपण के बारे में चौकाने वाला रहस्योद्घाटन करना चाहूँगा … “वेद” जो हिन्दू- सनातन धर्म का आधार है जिन्हें पश्चिमी देशों के एजेंटों ने जाबूझकर विकृत किया और जनमानस को गुमराह किया,जिसका बड़े पैमाने पर हमारी सभ्यता नुकसान झेल रही है ।

इस लेख में मैं फ्रेडरिक मैक्स मूलर की बात करूंगा वो भारतीय अध्ययन के पश्चिमी अकादमिक क्षेत्र के संस्थापको में से एक था उसका मानना था कि भारतीयों द्वारा ईसाई धर्म नहीं अपनाना बहुत बड़ी गलती साबित होगा क्योंकि उस दौर में उसके अनुसार भारत का प्राचीन धर्म अपने पतन पर था। उसका एक कथन बाद मशहूर भी हुआ की ” भारत को एक बार जीता जा चुका है और अबकी फिर शिक्षा के आधार पर जीता जायेगा” ..  देश की शिक्षा प्रणाली को भृष्ट करना,भारतीय शास्त्रों को गलत तरीके से प्रस्तुत करना ये उस दौर में इन जैसो का एक सोच समझी रणनीति का एक हिस्सा थे।

मैक्स मूलर ने अपनी पत्नी को लिखे एक पत्र के अनुसार .. ईसाई मिशनरियों व् गिरिजाघरों में उसे विशेष रूप से भारतीय वेदों,शास्त्रों को एक विशेष तरीके से अनुवाद करने की ट्रेनिंग दी गयी है जिससेे भाड़तीय वेदों को भृष्ट किया गया और इन्ही भृष्ट हो चुके वेदों के ज्ञान पर हिंदूओ ने विश्वास करना बन कर दिया.. जिसमे वो सफल भी रहा ।

“आप वेदों को पढ़े और मूलर के संस्करण के साथ तुलना कीजिये आपको अंतर पता चल जाएगा”

इस मिशन के लिए मैक्स मूलर को ही क्यों चुना गया?

मूलर ब्रिटिश सरकार में कर्मचारी था और सबसे महत्वपूर्ण व् देववाणी संस्कृत भाषा में पारंगत था..जब भारतीय भी संस्कृत में इतनी प्रवीण व् दक्ष नही थे । सन 1860 में संस्कृत के बोडेन प्रोफेसरशिप के चुनाव में वो बुरी तरह हारा,उसके अनुसार उसका जन्म से जर्मन होना और भारतय संस्कृति के व्याव्हातिक ज्ञान की कमी इस चुनाव में उसके हार का कारण बनी। हालांकि ब्रिटिश सरकार सरकार ने विशेष रूप से ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर ऑफ़ कम्पेरेटिव फिलोसॉफी के पद के लिए चुनाव किया और मूलर ने इस पद का अपने जीवन के अंत तक निर्वहन किया।

उसने उपनिषदों पर हमला करने के लिए उनका अनुवाद किया और एक भारतीय- यूरोपियन भाषाओं के विद्वान् “फ्रांज बोप” के साथ मिलकर संस्कृत भाषा पर शोध किया ।

मूलर ने “हितोपदेश” नामक भारतीय कथा संग्रह का एक अनुवादित संस्करण प्रकाशित किया,उसने इंग्लैंड में पांडुलिपियों का इस्तेमाल करते हुए संस्कृत में पूर्ण ऋग वेद को प्रकाशित किया .ये संस्करण ईस्ट इंडिया कंपनी के संग्रह में पाया जाता है।

वो ईसाई विचारधारा को हिन्दू समाज पर आरोपित करने का कट्टर पक्षधर था तथा इसी कुत्सित विचारधारा के तहत “हिन्दू धर्म में सुधार की आवश्यकता” जैसे विचार का समर्थन करता था.. जो धर्म अपने आप में सम्पूर्णता लिए हो उसे सुधारने चला था वो।

मैक्स मूलर ने “ब्रह्यो समाज आंदोलन” का समर्थन किया .. उसका मानना था कि ब्रह्यो समाज एक भारतीय रूप का ईसाई धर्म पैदा करेगा,वो किसी भी कीमत पर ईसाई धर्म को भारत पर आरोपित करना चाहता था ताकि हिंदुत्व का विनाश हो। मूलर के मार्गदर्शन में ब्रिटिश राज ने भारत में शिक्षा सुधारो के नाम पर एक बहुत बड़ी राशि का निवेश किया था । अगर हम।वर्तमान शिक्षा प्रणाली का इतिहास देखे तो पता चलता है किस तरीके से ऐतिहासिक घटनाओं,मुद्दों,तथ्यों को तोड़ मरोड़कर गलत तड़के से ग्रन्थो का अनुवाद कर प्रकाशित किया गया जिससे लोगो का उनमे विश्वास खत्म हो जाए ।

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